Maturity index of wheat

गेहूं की परिपक्वता की पहचान:-फसल तब काटी जाती हैंं जब दाने कठोर हो जाता हैंं और पुआल पीला सूखा और भंगुर हो जाता हैंं।
अनाज में लगभग 15 प्रतिशत नमी होने पर कटाई की जाती हैंं।….

  • फसल तब काटी जाती हैंं जब दाने कठोर हो जाता हैंं और पुआल पीला सूखा और भंगुर हो जाता हैंं।
  • अनाज में लगभग 15 प्रतिशत नमी होने पर कटाई की जाती हैंं।
  • गेहूं की कटाई के समय गेहूं की वाली पीली हो जानी चाहिये।
  • गेहूं की बुआई से 110-130 दिनों बाद पर गेहूं कटाई की जाती हैंं।

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Control of Root Aphid in Wheat

गेहूँ में जड़ माहू (एफिड) का नियंत्रण:-गेहूँ में माहु का प्रकोप नवंबर- फरवरी माह में देखने को अधिक मिलता है| वर्षा आधारित एवं देर से बुवाई की हुई फसल में यह कीड़ा अधिक नुकसान करता है| छोटे-छोटे पीले रंग के मच्छर गेहूँ के तने के आसपास दिखाई देते है|

  • गेहूँ में माहु का प्रकोप नवंबर- फरवरी माह में देखने को अधिक मिलता है|
  • वर्षा आधारित एवं देर से बुवाई की हुई फसल में यह कीड़ा अधिक नुकसान करता है|
  • छोटे-छोटे पीले रंग के मच्छर गेहूँ के तने के आसपास दिखाई देते है|
  • यह पौधों से रस चूसता है जिस कारण पौधा पीला पड़ने लगता है|
  • यह कीड़ा वायरस रोग फ़ैलाने में भी मदद करता है|
  • इस कारण लगभग 50% तक उपज में कमी आ सकती है|

नियंत्रण-

  • फसल की देर से बुवाई न करें|
  • यूरिया का प्रयोग ज्यादा न करे|
  • खड़ी फसल में इमिडाक्लोप्रिड 17.8% SL 60-70 मिली प्रति एकड़ की दर से स्प्रे करें|
  • या थायमेथॉक्ज़ाम 25% WG @ 100 ग्राम प्रति एकड़ की दर से  खाद/रेत/मिट्टी में मिला कर जमीन से दे और सिंचाई करें |

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Management of Black Rust disease in Wheat

गेहूँ का काला कण्डुआ रोग का नियंत्रण:- यह फफूंद पौधों की पत्तियों और तनों पर लम्बे,अण्डाकार आकृति में लाल-भूरे रंग के धब्बे बनाता है| संक्रमण के 10-20 दिनों के बाद धब्बे देखे जा सकते है| कुछ दिनों बाद यह धब्बे फट जाते ….

  • यह फफूंद पौधों की पत्तियों और तनों पर लम्बे,अण्डाकार आकृति में लाल-भूरे रंग के धब्बे बनाता है|
  • संक्रमण के 10-20 दिनों के बाद धब्बे देखे जा सकते है|
  • कुछ दिनों बाद यह धब्बे फट जाते है और इनमे से पाउडरी तत्त्व निकलता है|
  • रोग विभिन्न माध्यमों जैसे -सिंचाई, बरसात और हवा के द्वारा एक स्थान से दूसरे स्थान पहुँचता है और अन्य फसलों को क्षति पहुँचाता है |
  • काला कण्डुआ अन्य कण्डुआ की तुलना में अधिक तापमान 18 -30°से.ग्रे.पर फैलता है|

नियंत्रण-

  • कंडुआ रोग के नियंत्रण के लिए फसल चक्र अपनाना चाहिए|
  • रोग प्रति-रोधी किस्मों की बुवाई करें |
  • बीज उपचार बुवाई के चार सप्ताह तक कण्डुआ को नियंत्रित कर सकता है और उसके बाद इसे दबा सकते है।
  • एक ही सक्रिय घटक वाले कवकनाशी का बार-बार उपयोग नहीं करें।
  • कासुगामीसिन 5%+कॉपर ऑक्सीक्लोरिड 45% डब्लू.पी. 320 ग्राम/एकड़ या प्रोपिकोनाज़ोल 25% ई.सी.240 ग्राम/एकड़ का छिड़काव करें|

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Management of Brown Rust disease in Wheat

गेहूँ में भूरा कण्डुआ रोग का प्रबंधन:- यह रोग फफूंद से होता है | इसके लक्षण 10-14 दिनों में दिखने लग जाते है| यह फफूंद पत्तियों के ऊपरी सतह से शुरू होकर तनों पर लाल-नारंगी रंग के धब्बे बनता है |….

  • यह रोग फफूंद से होता है |
  • इसके लक्षण 10-14 दिनों में दिखने लग जाते है
  • यह फफूंद पत्तियों के ऊपरी सतह से शुरू होकर तनों पर लाल-नारंगी रंग के धब्बे बनता है | यह धब्बे 1.5 एम.एम.के अंडाकार आकृति के होते है|
  • यह रोग 15 -20°से.ग्रे. तापमान पर फैलता है
  • इसके बीजाणु विभिन्न माध्यमों जैसे- हवा, बरसात और सिंचाई के द्वारा एक स्थान से दूसरे स्थान पहुँचते है |

नियंत्रण-

  • फसल चक्र अपनाना चाहिए|
  • रोग प्रति-रोधी किस्मों की बुवाई करें |
  • बीज या उर्वरक उपचार बुवाई के चार सप्ताह तक कण्डुआ को नियंत्रित कर सकता है और उसके बाद इसे दबा सकते है।
  • एक ही सक्रिय घटक वाले कवकनाशी का बार-बार उपयोग नहीं करें।
  • कासुगामाईसिन 5% +कॉपर ऑक्सीक्लोरिड 45% डब्लू.पी. 320 ग्राम/एकड़ या प्रोपिकोनाज़ोल 25% ई.सी. 240 मिली /एकड़ का छिड़काव करें|

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Management of Yellow Rust disease in Wheat

गेहूँ का पीला कंडुआ रोग का प्रबंधन:- यह रोग फफूंद से होता है| यह फफूंद नारंगी-पीले रंग के बीजाणु के द्वारा रोगी खेत से स्वस्थ खेत में फैलता है| यह पत्तों की नसों की लंबाई के साथ पट्टियों में विकसित होकर छोटे-छोटे, बारीक़ धब्बे विकसित कर देता है|….

  • यह रोग फफूंद से होता है|
  • यह फफूंद नारंगी-पीले रंग के बीजाणु के द्वारा रोगी खेत से स्वस्थ खेत में फैलता है|
  • यह पत्तों की नसों की लंबाई के साथ पट्टियों में विकसित होकर छोटे-छोटे, बारीक़ धब्बे विकसित कर देता है|
  • धीरे-धीरे यह पत्तियों की दोनों सतह पर फ़ैल जाता है|
  • इस पर बने हुए पॉवडरी धब्बे 10-14 दिनों में फूट जाते है
  • यह रोग अधिक ठण्ड और नम जलवायु लगभग 10-15°से.ग्रे. तापमान पर फैलता है|

नियंत्रण-

  • कंडुआ रोग के नियंत्रण के लिए फसल चक्र अपनाना चाहिए|
  • रोग प्रति-रोधी किस्मों की बुवाई करें |
  • बीज या उर्वरक उपचार बुवाई के चार सप्ताह तक कण्डुआ को नियंत्रित कर सकता है और उसके बाद इसे दबा सकते है।
  • एक ही सक्रिय घटक वाले कवकनाशी का बार-बार उपयोग नहीं करें।
  • कासुगामीसिन 5%+कॉपर ऑक्सीक्लोरिड 45% डब्लू.पी. 320 ग्राम/एकड़ या प्रोपिकोनाज़ोल 25% ई.सी.240 मिली /एकड़ का छिड़काव करें|

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Irrigation Management of Wheat

गेहू मे सिंचाई प्रबंधन:- अच्छी फसल की प्राप्ति के लिए समय पर सिंचाई करना बहुत जरुरी होता है । फसल में गाभा के समय और दानो में दूध भरने के समय सिंचाई करनी चाहिए ।

गेहू मे सिंचाई प्रबंधन:-

  • अच्छी फसल की प्राप्ति के लिए समय पर सिंचाई करना बहुत जरुरी होता है।
  • फसल में गाभा के समय और दानो में दूध भरने के समय सिंचाई करनी चाहिए।
  • ठंड के मौसम में अगर वर्षा हो जाये तो सिंचाई कम भी कर सकते है
  • कृषि वैज्ञानिको के मुताबिक जब तेज हवा चलने लगे तब सिंचाई को कुछ समय तक रोक देना चाहिए।
  • कृषि वैज्ञानिको का ये भी कहना है की खेत में 12 घंटे से ज्यादा देर तक पानी जमा नहीं रहने देना चाहिए ।
  • गेहूँ की खेती में पहली सिंचाई बुआई के लगभग 25 दिन बाद करनी चाहिए।
  • दूसरी सिंचाई लगभग 60 दिन बाद और तीसरी सिंचाई लगभग 80 दिन बाद करनी चाहिए।

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How to control Armyworm/ Cutworm in Wheat

गेहूँ में सैनिक कीट/कटुआ का नियंत्रण:- पत्तियों का झड़ना इस कीट की उपस्थिति का प्राथमिक लक्षण है| इसके लार्वा पत्तियों पर क्षति पहुँचाते हैं| भारी उपद्रव बहुत विनाशकारी हो सकता है; इस स्थिति में लार्वा पौधे के ऊपरी भाग पर पहुँच कर ………

गेहूँ में सैनिक कीट/कटुआ का नियंत्रण :-

  • पत्तियों का झड़ना इस कीट की उपस्थिति का प्राथमिक लक्षण है|  
  • इसके लार्वा पत्तियों पर क्षति पहुँचाते हैं|
  • भारी उपद्रव बहुत विनाशकारी हो सकता है; इस स्थिति में लार्वा पौधे के ऊपरी भाग पर पहुँच कर बालियों के नीचे वाले भाग को काट देते है| एवं कुछ प्रजातियाँ मिट्टी में रहकर फसल के जड़ों को नुकसान पहुँचाती है|  
  • सैनिक कीट सुबह और शाम की अवधि के दौरान क्षति पहुँचाता है|

प्रबंधन –

  • इस कीट के लार्वा पत्तियों की निचली सतह पर पाये जाते है इन्हे आसानी से हाथ से पकड़कर नष्ट किया जा सकता है|
  • पक्षिओं को आकर्षित करने के लिए 4-5/एकड़ ‘’T’’ आकर की खूँटी का उपयोग करते है|
  • रासायनिक उपचार के लिए इमामेक्टिन बेंजोएट (5% एस.जी) 100 ग्राम/एकड़ या फिप्रोनिल (5% एस.सी) 400 मिली/एकड़ की दर से छिड़काव करें|

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Management of Termites in Wheat

गेहूँ में दीमक (उददी ) का प्रबंधन:- बुवाई के बाद और कभी-कभी परिपक्वता की अवस्था पर दीमक द्वारा फसल को नुकसान पहुँचाया जाता है| दीमक प्रायः फसल की जड़ों, बढ़ते पौधों के तनों, पौधे के मृत ऊतकों को नुकसान पहुँचाती है|………

गेहूँ  में दीमक (उददी ) का प्रबंधन:-

  • बुवाई के बाद और कभी-कभी परिपक्वता की अवस्था पर दीमक द्वारा फसल को नुकसान पहुँचाया जाता है|  
  • दीमक प्रायः फसल की जड़ों, बढ़ते पौधों के तनों, पौधे के मृत ऊतकों को नुकसान पहुँचाती है|
  • क्षतिग्रस्त पौधे पूरी तरह से सूख जाते हैं और आसानी से जमीन से उखाड़े जा सकते है|
  • जिन क्षेत्रों में अच्छी तरह सड़ी हुई खाद का प्रयोग नहीं किया जाता उन क्षेत्रो में दीमक का प्रकोप अधिक होता है|

प्रबंधन

  • बुवाई के पहले खेत में गहरी जुताई करें|
  • खेत में अच्छी सड़ी हुई खाद का ही उपयोग करे|
  • दीमक के टीले को केरोसिन से भर दे ताकि दीमक की रानी के साथ-साथ अन्य सभी कीट मर जाएँ|
  • बुवाई से पहले क्लोरोपायरीफोस (20% ई.सी ) @ 5 मिली/ किलो बीज से बीजोपचार करें ।  
  • क्लोरोपायरीफोस (20% ई.सी) @ 1 लीटर/ एकड़ को किसी भी उर्वरक के साथ मिलाकर जमीन से दें और सिंचाई कर दे|

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Major Diseases and Their Control Measures of Wheat

गेंहू की प्रमुख बीमारियाँ एवं उनका नियंत्रण:-गेंहू की प्रमुख बीमारियों में कण्डुआ (रस्ट) रोग प्रमुख है| कंडुआ रोग 3 प्रकार का होता है | पीला कंडुआ, भूरा कंडुआ और काला कंडुआ | पीला कंडुआ:- यह रोग पकसीनिया स्ट्रीफोर्मियस नामक फफूंद से होता है |…

गेंहू की प्रमुख बीमारियाँ एवं उनका नियंत्रण:-

गेंहू की प्रमुख बीमारियों में कण्डुआ (रस्ट) रोग प्रमुख है| कंडुआ रोग 3 प्रकार का होता है | पीला कंडुआ, भूरा कंडुआ और काला कंडुआ |

 

  • पीला कंडुआ:- यह रोग पकसीनिया स्ट्रीफोर्मियस नामक फफूंद से होता है | यह फफूंद नारंगी-पीले रंग के बीजाणु के द्वारा ग्रसित खेत से स्वस्थ खेत को प्रभावित करता है यह पत्तों की नसों की लंबाई के साथ पट्टियों में विकसित होकर छोटे-छोटे, बारीक़ धब्बे विकसित कर देता है| धीरे-धीरे यह पत्तियों की दोनों सतह पर फ़ैल जाता है| |
  • अनुकूल परिस्थितियां:- यह रोग अधिक ठण्ड और आद्र जलवायु लगभग 10-15° से.ग्रे. तापमान पर फैलता है| इस पर बने हुए पॉवडरी धब्बे 10-14 दिनों में फूट जाते है और विभिन्न माध्यमों जैसे- हवा, बरसात और सिंचाई के द्वारा एक स्थान से दूसरे स्थान पहुँचते है | इससे लगभग गेंहू की फसल में  25% हानि होती है|
  • भूरा कण्डुआ:- यह रोग पकसीनिया ट्रीटीसीनिया नामक फफूंद से होता है | यह फफूंद पत्तियों के ऊपरी सतह से शुरू होकर तनों पर लाल-नारंगी रंग के धब्बे बनता है | यह धब्बे 1.5 एम.एम.के अंडाकार आकृति के होते है|
  • अनुकूल परिस्थितियां:- यह रोग 15 -20°से.ग्रे. तापमान पर फैलता है| इसके बीजाणु विभिन्न माध्यमों जैसे- हवा,बरसात और सिंचाई के द्वारा एक स्थान से दूसरे स्थान  पहुँचते है | इसके लक्षण 10-14 दिनों में दिखने लग जाते है|
  • काला कण्डुआ:- यह रोग पकसीनिया ग्रेमिनिस नामक फफूंद से होता है | यह रोग बाजरे की फसल पर भी क्षति पहुँचाता है| यह फफूंद पौधों की पत्तियों और तनों पर लम्बे,अण्डाकार आकृति में लाल-भूरे रंग के धब्बे बनाता है| कुछ दिनों बाद यह धब्बे फट जाते है और इनमे से पाउडरी तत्त्व निकलता है जो की विभिन्न माध्यमों जैसे- सिंचाई, बरसात और हवा के द्वारा एक स्थान से दूसरे स्थान पहुँचता है और अन्य फसलों को क्षति पहुँचाता है |
  • अनुकूल परिस्थितियां:- काला कण्डुआ अन्य कण्डुआ की तुलना में अधिक तापमान 18 -30°से.ग्रे.पर फैलता है| बीजों को नमी (ओस, बारिश या सिंचाई) की आवश्यकता होती है और फसल को संक्रमित करने के लिए छह घंटे तक लगते हैं और संक्रमण के 10-20 दिनों के बाद धब्बे देखे जा सकते है|
  • नियंत्रण:-
  • कंडुआ रोग के नियंत्रण के लिए फसल चक्र अपनाना चाहिए|
  • रोग प्रति-रोधी किस्मों की  बुवाई करें |
  • बीज या उर्वरक उपचार बुवाई के चार सप्ताह तक कण्डुआ को नियंत्रित कर सकता है और उसके बाद इसे दबा सकता है।
  • एक ही सक्रिय घटक वाले कवकनाशी  का बार-बार उपयोग नहीं करें।
  • कासुगामीसिन 5%+कॉपर ऑक्सीक्लोरिड 45% डब्लू.पी. 320 ग्राम/एकड़ या प्रोपिकोनाज़ोल 25% ई.सी.240 ग्राम/एकड़ का छिड़काव करें|

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Nutrient Management in Wheat

गेहूं मे पौषक तत्व प्रबंधन:- गेंहू की उपज में पौषक तत्त्व प्रबंधन बहुत ही महत्वपूर्ण होता है मृदा मे उपलब्ध पौषक तत्त्व की जानकारी हेतु मिट्टी की जाँच बहुत आवश्यक है| इसी के आधार पर फसलो में पौषक तत्त्व प्रबंधन की रणनीति अपनाई जाती है|-

गेहूं मे पौषक तत्व प्रबंधन:- गेंहू की उपज में पौषक तत्त्व प्रबंधन बहुत ही महत्वपूर्ण होता है मृदा मे उपलब्ध पौषक तत्त्व की जानकारी हेतु मिट्टी की जाँच बहुत आवश्यक है| इसी के आधार पर फसलो में पौषक तत्त्व प्रबंधन की रणनीति अपनाई जाती है|-

  • अच्छे से सडी हुई गोबर की खाद या कम्पोस्ट को 15-20 टन/हे. के हिसाब से हर 2 साल में मिट्टी में मिलाना चाहिये|
  • गोबर की खाद डालने से भूमि की संरचना में सुधार और पैदावार में बढ़ोतरी होती है।
  • गेंहू में 88  कि.ग्रा. यूरिया, 160 कि.ग्रा ,सिंगल सुपर फॉस्फेट एवं 40 कि.ग्रा. म्युरेट ऑफ़ पोटाश प्रति एकड़ के हिसाब से उपयोग करना चाहिये|
  • युरिया का उपयोग तीन भागों में करना चाहिए|
    1.) 44  कि.ग्रा. यूरिया की मात्रा बोनी के समय करें।
    2.) शेष 22 कि.ग्रा. पहली सिंचाई के समय डाले।
    3.) शेष 22 कि.ग्रा., दुसरी सिंचाई के समय डाले।
  • आशिंक सिंचाई उपलब्ध हो एवं अधिकतम दो सिंचाई होने पर यूरिया @ 175 , सुपर सिंगल फॉस्फेट@ 250 और म्युरेट ऑफ़ पोटाश @ 35-40 कि.ग्रा प्रति हेक्टेयर डाले।
    असिंचित अवस्था में नाइट्रोजन फास्फोरस एवं पोटॉश की पूरी मात्रा डालें|
  • यदि गेंहू की बुवाई मध्य दिसम्बर में करते है तो नत्रजन की 25 प्रतिशत मात्रा कम डालना चाहिये|

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